लिटरेचर फेस्टिवल-2020 में अभिनेत्री नंदिता दास ने पत्रकारों से बातचीत में खुलकर सीएए और एनआरसी का विरोध किया। उन्होंने कहा- दोनों कानूनों में एक बेहद खतरनाक रिश्ता है। यह ऐसा कानून है, जिसके जरिए आपसे भारतीय होने का सूबत मांगा जा रहा है। देश में ऐसा पहली बार हो रहा है, जब धर्म के नाम पर लोगों को विभाजित किया जा रहा है। दिल्ली की तरह शाहीन बाग हर जगह बन रहे हैं। देश में बेरोजगारी इतनी बढ़ गई है, जो पहली कभी नहीं थी। आर्थिक हालत में बद्तर होते जा रहे है।
उन्होंने कहा कि फिल्मी जगत के लोग भी पहली बार इस तरह के कानून के खिलाफ बोलने लगे हैं। सभी को बोलने का हक है। नसीरूद्दीन शाह और अनुपम खेर के बीच बयान देने से बचती नजर आईं नंदिता ने कहा चीखने चिल्लाने से कोई काम नहीं होगा। मैं अपनी बात कहूंगी, जो मुझे बोलने की आजादी है। यह संदेश देने का वक़्त नहीं बल्कि सोचने का वक़्त है कि किस तरह का समाज चाहते हैं। आज मंटो होते तो शायद वे भी दुखी होते। 70 साल बाद भी हमें वैसे ही बांटने की कोशिश हो रही है।
सीएए और एनआरसी के विरोध में हिंसा बिल्कुल गलत
नंदिता दास ने कहा- हमारा एक-दूसरे के साथ यदि मतभेद भी है तो असहमति के लिए भी सहमत होना चाहिए। इस पर कोई बहस नहीं करनी चाहिए। ट्रोलिंग करने से या एक दूसरे पर, लोगों को मारने-पीटने का मैं पूरी तरह से विरोध करती हूं, हिंसा करना गलत है। सीएए और एनआरसी को लेकर फिल्म इंडस्ट्री के बंटने के सवाल पर नंदिता दास ने कहा- इंडस्ट्री मेरी नहीं है। मैंने इंडस्ट्री से हमेशा बाहर रहकर काम किया है। मैंने 40 फिल्में की हैं। तब मैं दिल्ली में रहती थी, वहां तो कोई इंडस्ट्री भी नहीं है। आज सीएए और एनआरसी को लेकर हर तरह के लोग लिख रहे हैं। इसकी गहराई तक जा रहे हैं।
मैं 9 साल के बच्चे की मां हूं
नंदिता दास ने कहा- ये अपने अंदर के कान्शियस की बात है, कि आप किस तरह का समाज चाहते हैं। मैं 9 साल के बच्चे की मां हूं। मैं उसके लिए किस तरह का समाज छोड़कर जाना चाहती हूं। ये उसका सवाल है। ये आप दूसरों पर नहीं बल्कि अपने पर पहले देखें कि हम क्या कर रहे हैं। यदि हम उसको एक संवेदनशील समाज, दुनिया और वातावरण छोड़ना चाहते हैं तो इसके खिलाफ हमें जरूर आवाज उठानी पड़ेगी।